
विशाखापत्तनम | 19 जुलाई 2026 | पेपर पत्रिका विशेष रिपोर्ट
आंध्र प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी योजना के तहत विशाखापत्तनम (विजाग) को देश का प्रमुख AI और Hyperscale Data Centre Hub बनाने की दिशा में तेजी से काम हो रहा है। सरकार का लक्ष्य वैश्विक प्रौद्योगिकी कंपनियों को आकर्षित कर शहर को डिजिटल अर्थव्यवस्था का केंद्र बनाना है। लेकिन इस विकास योजना के साथ-साथ पर्यावरणीय चिंताएँ भी गहराती जा रही हैं। हाल के दिनों में कई पर्यावरण संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय नागरिक समूहों ने प्रस्तावित डेटा सेंटर परियोजनाओं के विरोध में प्रदर्शन करते हुए आरोप लगाया है कि इन परियोजनाओं से शहर के जल संसाधनों, पर्यावरण और स्थानीय समुदायों पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
पर्यावरण समूहों का कहना है कि परियोजनाओं की स्वीकृति प्रक्रिया में पर्याप्त सार्वजनिक परामर्श नहीं हुआ और पर्यावरणीय प्रभावों का स्वतंत्र एवं व्यापक मूल्यांकन आवश्यक है। दूसरी ओर राज्य सरकार और परियोजना समर्थकों का दावा है कि डेटा सेंटर राज्य के आर्थिक विकास, रोजगार और डिजिटल अवसंरचना के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं तथा जल एवं बिजली की पर्याप्त व्यवस्था की जा रही है। (The Times of India)
क्या है प्रस्तावित डेटा सेंटर परियोजना?
आंध्र प्रदेश सरकार विशाखापत्तनम को दक्षिण भारत के प्रमुख डेटा सेंटर और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) निवेश केंद्र के रूप में विकसित करना चाहती है। विभिन्न चरणों में कई बड़ी घरेलू और अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के निवेश प्रस्ताव सामने आए हैं।

इन परियोजनाओं का उद्देश्य है—
- AI और क्लाउड कंप्यूटिंग सेवाओं का विस्तार।
- भारत में डिजिटल डेटा स्टोरेज क्षमता बढ़ाना।
- वैश्विक तकनीकी कंपनियों को आकर्षित करना।
- स्थानीय आईटी उद्योग को बढ़ावा देना।
- उच्च क्षमता वाली डिजिटल अवसंरचना विकसित करना।
राज्य सरकार का कहना है कि प्रस्तावित डेटा सेंटरों की संयुक्त क्षमता लगभग 6 गीगावाट तक विकसित की जा सकती है।
विरोध क्यों हो रहा है?
पर्यावरण संगठनों का कहना है कि इतनी बड़ी संख्या में डेटा सेंटर स्थापित होने से शहर पर प्राकृतिक संसाधनों का दबाव बढ़ सकता है।

मुख्य चिंताएँ हैं—
- भारी मात्रा में पानी की आवश्यकता।
- अत्यधिक बिजली की खपत।
- तापीय (Heat) प्रभाव।
- शोर प्रदूषण।
- हरित क्षेत्रों पर दबाव।
- जलाशयों और पारिस्थितिकी तंत्र पर संभावित प्रभाव।
विशेष रूप से मुदासरलोवा जलाशय (Mudasarlova Reservoir) और उसके कैचमेंट क्षेत्र के निकट प्रस्तावित परियोजनाओं को लेकर पर्यावरणविदों ने चिंता जताई है। (The New Indian Express)
पर्यावरण समूहों की प्रमुख मांगें
प्रदर्शन कर रहे संगठनों ने सरकार से मांग की है कि—
- विस्तृत और स्वतंत्र पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) कराया जाए।
- सभी परियोजनाओं पर सार्वजनिक सुनवाई आयोजित की जाए।
- जल उपयोग का वैज्ञानिक अध्ययन सार्वजनिक किया जाए।
- स्थानीय समुदायों की सहमति सुनिश्चित की जाए।
- जैव विविधता और जलाशयों की सुरक्षा के लिए स्पष्ट योजना बनाई जाए।
उनका कहना है कि विकास परियोजनाएँ पारदर्शिता और पर्यावरणीय संतुलन के साथ आगे बढ़नी चाहिए। (Human Rights Forum)
सरकार का पक्ष
आंध्र प्रदेश सरकार ने पर्यावरण संबंधी आशंकाओं को खारिज करते हुए कहा है कि परियोजनाओं के लिए पर्याप्त जल और बिजली उपलब्ध कराने की योजना बनाई गई है।
सरकार के अनुसार—
- शहर की भविष्य की जल आवश्यकताओं का आकलन किया गया है।
- अतिरिक्त जल स्रोतों और अवसंरचना पर कार्य जारी है।
- उद्योगों के लिए उपचारित (treated) जल के उपयोग को बढ़ावा दिया जाएगा।
- परियोजनाएँ सभी वैधानिक नियमों का पालन करेंगी।
सरकारी प्रतिनिधियों का कहना है कि सोशल मीडिया पर कई दावे भ्रामक हैं और शहर के संसाधनों पर तत्काल संकट की आशंका सही नहीं है। (The Times of India)
उच्च न्यायालय तक पहुँचा मामला
विवाद के बीच आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका (PIL) भी दायर की गई है।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि—
- प्रस्तावित परियोजना के लिए मंदिर की भूमि आवंटित की गई।
- पर्यावरणीय नियमों का पर्याप्त पालन नहीं हुआ।
- परियोजना का स्थान संवेदनशील पारिस्थितिक क्षेत्र के निकट है।
याचिकाकर्ता ने भूमि आवंटन और पर्यावरणीय स्वीकृति को चुनौती दी है। मामला अभी न्यायालय में विचाराधीन है।
किसानों और विस्थापित परिवारों की चिंता
पर्यावरणीय मुद्दों के अलावा भूमि अधिग्रहण भी विवाद का कारण बना हुआ है।
कुछ प्रभावित किसानों ने आरोप लगाया है कि—
- मुआवजा समय पर नहीं मिला।
- रोजगार के आश्वासन पूरे नहीं हुए।
- पुनर्वास की प्रक्रिया धीमी है।
हाल ही में प्रभावित परिवारों ने प्रशासन के समक्ष प्रदर्शन कर लंबित मुआवजे और रोजगार की मांग दोहराई। (The Coastal Times)
डेटा सेंटर इतने पानी का उपयोग क्यों करते हैं?
डेटा सेंटर हजारों सर्वरों से संचालित होते हैं।

इन सर्वरों को लगातार ठंडा रखने के लिए—
- शीतलन प्रणाली (Cooling Systems)
- एयर कंडीशनिंग
- जल आधारित कूलिंग
- बैकअप ऊर्जा प्रणाली
का उपयोग किया जाता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक डेटा सेंटर ऊर्जा दक्ष तकनीकों का उपयोग करते हैं, लेकिन बड़े Hyperscale केंद्रों की जल और बिजली की आवश्यकता फिर भी काफी अधिक हो सकती है। (The Times of India)
भारत में AI अवसंरचना की बढ़ती दौड़
भारत तेजी से AI आधारित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है।
डेटा सेंटरों की मांग बढ़ने के प्रमुख कारण—
- क्लाउड सेवाओं का विस्तार।
- डिजिटल भुगतान।
- ई-कॉमर्स।
- जनरेटिव AI।
- सरकारी डिजिटल सेवाएँ।
- 5G नेटवर्क।
- डेटा स्थानीयकरण (Data Localization)।
इसी कारण कई राज्य डेटा सेंटर के निवेश को आकर्षित करने के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं।
वैश्विक स्तर पर भी बढ़ रहा विरोध
विशाखापत्तनम अकेला शहर नहीं है जहाँ डेटा सेंटरों को लेकर पर्यावरणीय चिंताएँ उठी हैं।
हाल के महीनों में अमेरिका सहित कई देशों में भी डेटा सेंटरों के विस्तार के खिलाफ प्रदर्शन हुए हैं। प्रदर्शनकारियों ने जल उपयोग, ऊर्जा खपत और स्थानीय समुदायों पर प्रभाव को प्रमुख मुद्दे बताया। (Reuters)
विकास बनाम पर्यावरण
यह विवाद एक व्यापक नीति प्रश्न भी उठाता है—
क्या डिजिटल अर्थव्यवस्था के लिए आवश्यक आधारभूत संरचना का विकास पर्यावरणीय संरक्षण के साथ संतुलित किया जा सकता है?
विशेषज्ञों का मानना है कि समाधान विरोध या विकास में से किसी एक को चुनना नहीं, बल्कि—
- हरित ऊर्जा का उपयोग,
- उपचारित जल का अधिकतम इस्तेमाल,
- ऊर्जा दक्ष डेटा सेंटर,
- पारदर्शी पर्यावरणीय आकलन,
- स्थानीय समुदायों की भागीदारी,
जैसे उपायों में निहित है।
वर्तमान स्थिति
फिलहाल—
- पर्यावरण समूह विरोध जारी रखे हुए हैं।
- सरकार परियोजनाओं को आगे बढ़ाने के पक्ष में है।
- उच्च न्यायालय में कानूनी प्रक्रिया चल रही है।
- प्रभावित किसान और स्थानीय संगठन अपनी मांगों पर कायम हैं।
- डेटा सेंटर निवेश को लेकर सार्वजनिक बहस तेज हो गई है। (The New Indian Express)
निष्कर्ष
विशाखापत्तनम में प्रस्तावित डेटा सेंटर परियोजनाएँ भारत की डिजिटल और AI महत्वाकांक्षाओं का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इनसे निवेश, रोजगार और तकनीकी विकास की नई संभावनाएँ जुड़ी हैं। वहीं दूसरी ओर पर्यावरण समूह जल संसाधनों, भूमि उपयोग, पारिस्थितिकी और स्थानीय समुदायों के अधिकारों को लेकर गंभीर सवाल उठा रहे हैं। आने वाले समय में इस परियोजना की सफलता केवल निवेश के आकार से नहीं, बल्कि इस बात से भी तय होगी कि विकास, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक न्याय के बीच संतुलन किस प्रकार स्थापित किया जाता है।
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